गुरुवार, 10 अप्रैल 2008

ग़ज़ल

नाउम्मीदगी इस कदर दिलनशीं हुई है
की सेहर भी सियाह रात सी लगती है

कौन रोकेगा वक्त के बेरहम हाथों को
की मेरे एत्काद का आसमान भी कुफ्र की ज़मीन लगती है

दस्तबस्ता खड़ी है जीस्त अजल की आड़ में
की हयात भी अपनी ,परछाईं सी लगती है

जी लेंगे सभी पी कर बादा -ऐ-ज़िंदगी
पर उफ़ ये बेगानगी जुदा सी लगती है

हुक्मरानों,वाइजो,पय्म्बरों से क्या नाफरमानी
की मेरी जवानी भी मुझको खुदा सी लगती है .

1 टिप्पणी:

Apoorva ने कहा…

Great.... work man... u should pend down and publish a book great work
myself
Apoorva Mandloi
I am journalist by profession