गुरुवार, 10 अप्रैल 2008

अशआर

हर हर्फ़ पे खुदा है चेहरा कोई न कोई
तखलीख ज़रूरी नही ,ज़रूरत है पहचान की .
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सिक्कों से न तोल मुझे ,बहुत ऊँची है परवाज़ मेरी
तुमको मुबारक हो तीरगी तुम्हारी ,मुझे रौशनी की तलाश है ।
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मैं तो इक ख़याल हूँ मुझ पर कोई बंदिश नही
फिरता हूँ आवारा थोड़ा बदगुमां ही सही ।
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मुज्तारिब दिल क्यों, कोई कैसे बताये
एक हवा चली और दिल के वीरान् गोशों को ल्म्स किया ।
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शर्मसार हूँ अपनी नाकामियों पर इस कदर
की हर एक निवाला लगता है मुझे दुआओं की तरह ।
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बड़ी बातें न किया करो ,थोड़ा मुलायाजा भी किया करो
जो होते सुखन के कद्रदान 'प्रताप' ,तो गालिब यूं मुफ़लिसी में न मरा होता ।
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तेरे शहर की हवाओं में तहजीब जरा कम है
दुआएं तो बहुत हैं दुआओं में असर थोड़ा कम है।
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इश्क की राह कुछ ऐसे चले ,क्या छोडें ,क्या तक्मील करें
सरे राह निशाँ-e-चाक कदम ,थोडी और चलें ,थोडी और जलें।
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आगे -आगे देखिये 'प्रताप' मुकाम और भी हैं
पंख को परवाज़ दे ,आसमान के परे जहाँ और भी हैं।
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बस्ती-बस्ती ,मेले -मेले, हाट लगाए फिरता हूँ
मोल क्या दोगे बोलो तुम हर्फों के बिक जाने का।
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चन्द महकती यादों से इक गुल उधार ले लूँ
गुलशन के महकाने को फकत एक कली ही काफ़ी है ।

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अभी मरा नही है इंसान ,अभी नउम्मीद न हो
चल उस गली में ढूंढें ,लुक्का-छिपी खेल रहा हो

तनहा -तनहा बैठा न कर उर्दू ज़बानी सीख ले
कौन जाने कब कहाँ दीवारें बातें करती हों

चूल्हों की साँसे थम गई,पावों की आहट जम गई
रात गए जाने कौन राग यमन को छेDaa हो

तुमने अगर समझ लिया है हम को भी समझा दो
इश्क तो हारा बाराह ,अदावत ही कुछ असर रखती हो

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