नाच उठी शहनाई
..........उस्ताद बिस्मीलाह खान को नज्र ।
तडके सुबह से ही बनारस में एक शहनाई
छत की मुंडेर पर नाच रही है
पूछा किया जो की मंज़र क्या है
झूमती,इठलाती कहने लगी
वो साँसे जो मुझमें साँस फूंकती थीं
वो भी दम तोड़ गयीं
वो फूँक जिस फूँक पर मैं थिरकती थीं
वो भी न जाने कहाँ खो गयीं
एक ही उंगलियाँ थीं जो राह दिखा सकतीं थीं
वो भी थक कर सो गयीं
खुश क्यों न होऊं ,नाचूं क्यों नहीं
बहुत जल्द मैं भी फना हो जाउंगी
और 'उस्ताद' की आगोश में चैन से सो जाउंगी
......................कौन मरहूम हुआ है ,कौन जाने
मरा है साज़गर या मर गया है साज़ कौन जाने ???
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