शाम पलकों पे बैठ ,रात की दस्तक देती है
मैं दहलीज़ पे दिया जलाये, जाने कब से बैठी हूँ
दीये की लौ के संग जलते -जलते
मैं भी रोशन हो गई
जलती थी मैं एक सदी से
अब बुझी -बुझी सी लेटी हूँ
उठता है धुआं सा दिल से
आंखों से वो मैं पीती हूँ
..........और धुआं उठता रहा .
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