सोमवार, 7 अप्रैल 2008

हमजोली

शाम पलकों पे बैठ ,रात की दस्तक देती है

मैं दहलीज़ पे दिया जलाये, जाने कब से बैठी हूँ

दीये की लौ के संग जलते -जलते

मैं भी रोशन हो गई

जलती थी मैं एक सदी से

अब बुझी -बुझी सी लेटी हूँ

उठता है धुआं सा दिल से

आंखों से वो मैं पीती हूँ

..........और धुआं उठता रहा .

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