Boondein
RAS BOONDA BARSE
सोमवार, 7 अप्रैल 2008
दुआएं
ख्वाब सजते थे गुलमोहर के उस दरख्त पर शाम-ओ-सेहर
कभी मांग लेते थे पत्तियाँ दुआओं की
कभी तोड़ लाते थे कलियाँ मुरादों की
ख्वाब अब भी सजते हैं बूढे से गुलमोहर के उस दरख्त पर
बूढी कदीम सी दुआओं के संग .
कोई टिप्पणी नहीं:
एक टिप्पणी भेजें
नई पोस्ट
पुरानी पोस्ट
मुख्यपृष्ठ
सदस्यता लें
टिप्पणियाँ भेजें (Atom)
मेरे बारे में
shailesh pratap singh
मेरा पूरा प्रोफ़ाइल देखें
ब्लॉग आर्काइव
▼
2008
(12)
►
मार्च
(1)
▼
अप्रैल
(10)
हमजोली
दुआएं
अशआर
तस्बीह कर के वो मुझको दे गया है ज़िंदगी एक रात के ल...
ग़ज़ल
नाच उठी शहनाई
सौगात
इंतज़ार--चाय वाली अम्मा .
आज रंग है माँ
कोई बात चले
►
जुलाई
(1)
►
2009
(5)
►
जनवरी
(1)
►
मार्च
(3)
►
अगस्त
(1)
►
2010
(3)
►
अक्टूबर
(3)
►
2013
(1)
►
जून
(1)
कोई टिप्पणी नहीं:
एक टिप्पणी भेजें