सोमवार, 28 अप्रैल 2008

सौगात

लम्हें टपक कर लाते हैं सौगात
कुछ मरहूम से दिन ,
कुछ टिमटिमाती यादें ,कुछ सीले से दिन ,
गर्म साँसों की फूकों से डरता है एक लिफाफा
खुले जो ,तो खुल जाए जहाँ सारा
शब्द साए से डराते हैं ...मंडराते हैं उस वर्क पे
हर एक हर्फ़ नज़र आता है कायनात सारा
किसी दरक्खत, किसी रुक्न के पीछे से,
अब भी झांकता है कोई साया
माजी नही तो और क्या है !!!!
गुज़रा हुआ एक लम्हा ,
समेटे हुए है अपने में एक सदी सारा .

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