सोमवार, 28 अप्रैल 2008

इंतज़ार--चाय वाली अम्मा .

कदीम[प्राचीन ] सी गली के उस मोड़ पे ,
बेनूर से उस बोसीदा[सड़े-गले] कूचे की चौखट पर ,
पोशीदा [छुपा] बैठा ,जलता रहता है एक चिराग ,
धुन्ध्लाई हुई अपनी ज़र्द आंखों से,
राहगीरों की परछाइयों को बड़े गौर से देखता है ,
की इन आने-जाने वालों में उस के बेटे का चेहरा तो नही ,
जो नाबीना [अंधी] बुढ़िया कोठरी में खांसते ,
बरसों से रात को जगाये रहती है ,
पहलु में अपने ,सदियों की ऊंघती नींद बिठाये रखती है।

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