शुक्रवार, 21 अगस्त 2009

अशआर


अफ़साने ढूँढ़ते हैं किरदार अपने-अपने
चलो चेहरों के आइनों में ढूँढ ले चेहरे अपने -अपने .
............................................
खुशबू है हवाओं में,किसका गेसू फैला है
रोटी भी तो खानी है,फांकों का भी तो पहरा है .

कोई टिप्पणी नहीं: