रविवार, 22 मार्च 2009

झरोखा

झरोखा
घर की दीवारें कोनो में अक्सर ये कानाफूसी करती हैं
की हमने ही इस छत को सर पे बिठा रखा है ,
और इस दरोबाम को आशियाना बना रखा है
..........वरना ये झरोखा तो 'विभीषण' निकला
जिसने आँधियों से दोस्ती कर रखी है
और उन्हें "सेफ-पैसेज" दे
अन्दर बुला हमारे सीने पर वार करवाता है
.......बुरा हो इस मनहूस खिड़की का
जो आए दिन फडफडआती रहती है
देखो तो मुई ने धुप को भी अन्दर बुला कर बिठा रखा है
अब तो फर्श पर पाँव भी जलते हैं
......शिकायतों की फेहरिस्त दर्ज हुयी ,फरमान जारी हुआ
और खिड़की को दीवारों में चुनवा दिया गया ।
दीवारों पर अब फफूंद पड़ गई है ......सीने से पलस्तर झड़-झड़ कर झर्रोखे का मातम मनाता है ,
......सीली दीवारें अब मौन रहती हैं ।
Shailesh Pratap Singh
E-mail:babashailesh11@gmail.com

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