बुधवार, 26 मार्च 2008

मुन्तज़िर

मुन्तज़िर
.........अमृता प्रीतम को नज्र
पहली बारिश में जब भीग़ रहे थे मैं और तुम
पैराहन भी कुछ गीला था ..कुछ- कुछ तन भी गीला था
सूखा मन अब भी बूंदों को टकटकी लगाये देख रहा था
खैर मन का क्या ।!!!
इठलाती ,बल खाती,नग्मात रचाती
बूंदों की मौसकी में जब तुम गम थे
तब मैंने चुपके से एक बूँद अपनी हथेली में छुपा रखी थी
सोचा था रात पड़े उससे आंखों में डालूँगी
..........वो कहते हैं पीर पुराने
पहली बारिश की बूंदों को आंखों में रख लेने से
रूह को सकूं मय्यसर हो जाता है
कोई अपना बिछ्दा हुआ फ़िर मिल जाता है

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