शुक्रवार, 22 अक्टूबर 2010

माँ


चाँद का तकिया है, रात का बिछोना है
ऊँघते लम्हों के हाथों में तारों का झुनझुना है
लोरी नहीं,नींद नहीं,सपना कहाँ है
ढूँढता हूँ हर कहीं
माँ तू कहाँ है..माँ तू कहाँ है !!!

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