भीगे अब्रों में लिपटा चाँद
भीगती रातों की वो मुसलसल कोशिश
डर था कहीं जलती बूँदें जला न दें
मोम से जिस्मों को कहीं पिघला न दें
कहीं नगमा ,कहीं साज़
कहीं सोज़ ,कहीं आब
रात वही तस्सवुर की,
बरस रही है बूँदें लिए,
तेरे सौंधे जिस्म की खुशबू सी
हर बूँद की खनक में आवाज़ तेरी है
जागी-जागी हर तल्ख़ रात को तलाश तेरी है
आरजू मुजमिंद हैं भीगे लबों के लिए
की ए हमनशीं मुज्तरीब[ बेचैन] हैं बिजलियाँ दिल में
......की आओ भीगती रातों क जाम पिये
और रूह को जिस्मों के पैराहन से आज़ाद करें
की फिर जब अगली शब्
कोई भीगी सी रात मुसलसल कोशिश करे
तो बूँदें बन कर हम अपने ही जिस्मों पर बरस पड़ें !!
भीगती रातों की वो मुसलसल कोशिश
डर था कहीं जलती बूँदें जला न दें
मोम से जिस्मों को कहीं पिघला न दें
कहीं नगमा ,कहीं साज़
कहीं सोज़ ,कहीं आब
रात वही तस्सवुर की,
बरस रही है बूँदें लिए,
तेरे सौंधे जिस्म की खुशबू सी
हर बूँद की खनक में आवाज़ तेरी है
जागी-जागी हर तल्ख़ रात को तलाश तेरी है
आरजू मुजमिंद हैं भीगे लबों के लिए
की ए हमनशीं मुज्तरीब[ बेचैन] हैं बिजलियाँ दिल में
......की आओ भीगती रातों क जाम पिये
और रूह को जिस्मों के पैराहन से आज़ाद करें
की फिर जब अगली शब्
कोई भीगी सी रात मुसलसल कोशिश करे
तो बूँदें बन कर हम अपने ही जिस्मों पर बरस पड़ें !!
1 टिप्पणी:
बूँदें बन कर हम अपने ही जिस्मों पर बरस पड़ें !
-बहुत खूब सोच!
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