एक सौ सोलहवां चाँद
सुबह का भूला ....शाम को मैं साहिल पे बैठा
लहरों की रिले-रेस देख रहा था
कब कौन सी छोटी लहर अपने छोटे कद का फायदा उठा ,
डौज मारते, बड़ी लहरों के काँधों के नीचे से निकल जाती
कह पाना मुश्किल था ।
....कब कौन सी बड़ी लहर सरपट भागती हुई
उन छोटी लहरों को पीछे छोड़ देती
कह पाना मुश्किल था ।
कब कौन सी लहर [छोटी या बड़ी] दूर साहिलों पर
अंकित end mark को छु रही होती
कह पाना मुश्किल था ।
इस आपा-धापी में दूर शांत समंदर में एक आवाज़ सुनायी देती
"on your mark set go"
और फ़िर लहरों की दौड़ शुरू हो जाती
'छोटी बड़ी लहरें" -मन भी शायद दौड़ रहा था ...
.....खेल दिलचस्प दौर पे था की तभी
.....सूरज अपनी दिन भर की प्यास भुझाने समंदर में गोते लगाने आया,
मैं लपका उसकी तरफ़ कहीं डूब न जाए
समंदर गहरा है,तैरना भी तो नही आता उसे
बड़ी जद-ओ-जेहद के बाद उसे बचा कर लाया हूँ
पानी ज़्यादा पी गया ,चेहरा भी कुछ सफ़ेद पड़ गया
तवे की आंच पर सेंक कर कुछ गर्मी दी है
रात भर पेड़ पर सूखने को लटकाया है
.....रात शहर वालो का कहना था
की आज का चाँद बड़ा खूबसूरत है ।
.....सुबह तलक पानी सूख जायेगा
सुबह सूरज फिर निकल जायेगा ।
Shailesh Pratap singh
E-mail:babashailesh11@gmail.com
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