सोमवार, 7 जुलाई 2008

वो ज़मीन वो आसमान कहाँ है?

रूह बरबस ही पूछती है ,दीवाने तेरा मकान कहाँ है ,

हम अहद [वक्त] के मारों का पैकर[जिस्म]-ऐ -निशाँ कहाँ है ।



कुछ लुत्फ़ उठा लेते हैं यूँ भी,यूँ ही बहते जाते हैं हम भी ,

मौज-ऐ -दरिया को अब समंदर से मिलने का गुमान कहाँ है।



नाचा-थिरका तमाम उम्र ,अब् दम का सबब पूछे है ,

बशर तू फूँक सके तो फूँक पुतले में अब जान कहाँ है ।



सुखन का सरमाया है, थोड़ा रूहानी.थोड़ा रूमानी ,

इंक़लाब जो ला सके वो कलाम,वो अवाम कहाँ है ।



सुन कर आवाज़-ऐ-ज़रस[घंटी],सदा -ऐ-आजान भीड़ लगी है मुर्दों की ,
रगों में जो रवानगी ला दे वो नए मज़हब का नया इंसान कहाँ है।




मुद्दतें गुजरीं ,भूली दुनिया 'प्रताप' ,तारीख में तेरा नाम कहाँ है ,

तुने बसाया था जो खुदाया ,वो ज़मीन,वो आसमान कहाँ है।





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