रूह बरबस ही पूछती है ,दीवाने तेरा मकान कहाँ है ,
हम अहद [वक्त] के मारों का पैकर[जिस्म]-ऐ -निशाँ कहाँ है ।
कुछ लुत्फ़ उठा लेते हैं यूँ भी,यूँ ही बहते जाते हैं हम भी ,
मौज-ऐ -दरिया को अब समंदर से मिलने का गुमान कहाँ है।
नाचा-थिरका तमाम उम्र ,अब् दम का सबब पूछे है ,
बशर तू फूँक सके तो फूँक पुतले में अब जान कहाँ है ।
सुखन का सरमाया है, थोड़ा रूहानी.थोड़ा रूमानी ,
इंक़लाब जो ला सके वो कलाम,वो अवाम कहाँ है ।
सुन कर आवाज़-ऐ-ज़रस[घंटी],सदा -ऐ-आजान भीड़ लगी है मुर्दों की ,
रगों में जो रवानगी ला दे वो नए मज़हब का नया इंसान कहाँ है।
मुद्दतें गुजरीं ,भूली दुनिया 'प्रताप' ,तारीख में तेरा नाम कहाँ है ,
तुने बसाया था जो खुदाया ,वो ज़मीन,वो आसमान कहाँ है।
कोई टिप्पणी नहीं:
एक टिप्पणी भेजें